अहंकार – भगवान बुद्ध की कहानी

राजा का कहानी – अहंकार – भगवान बुद्ध की कहानी

अहंकार - भगवान बुद्ध की कहानी
अहंकार – भगवान बुद्ध की कहानी

वैशाली के दंडनायक ने भगवान बुद्ध से उसके घर पर आहार ग्रहण करने की प्रार्थना की। भगवान बुद्ध बोले_” भंते ! बुद्ध कॄपन की भिक्षा स्वीकार नहीं करते, दंडनायक को लगा कि वो इतना समॄद हैं । फिर भी भगवान बुद्ध ने ऐसा क्यों बोला होगा ? उसे लगा कि वह दान नहीं देता, इसलिए उन्होंने उन्हें ऐसा कहा ।

उसने अपना सारा धन याचको को दान कर दिया। यह समाचार सुनकर बुद्ध मुस्कुराते हुए बोले संपदा को लुटा फेकने का नाम दान नहीं कहते , पात्र कुपात्र का विचार किए बिना ही सचित साधनो को भावुकतावश फेंकने लगना , अर्जित पुजी को अंधेरे में कुएं में डालना है । अगले दिन फिर दंडनायक ने पुनः बुद्ध से उसके यहां भोजन ग्रहण करने की प्रार्थना की। बुद्ध बोले भंते ! तुम प्रथम कोटी के दान करने का साहस जुटाओ ।

दंडनायक ने बहुत विचार किया कि प्रथम कोटी दान क्या होगा , । ? विचारने पर उसे यह महसूस हुआ कि इससे पूर्व का दान अहंकार के पोषण और ख्याति की प्राप्ति के लिए था, । उसने सोचा कि वस्तुत ऐसा क्या है, जिस पर मात्र मेरा अधिकार है। विचार करने पर उसे यह भान हुआ कि स्वामित्व का भाव ही समस्त समस्याओ की जड़ है। इसके त्यागने पर जो भी दान दिया जाएगा, वह प्रथम कोटी का होगा !

अपने अहंकार को नष्ट कर वह पुनः बुद्ध के सम्मुख उपस्थित हुआ , और उनसे वहीं प्राथना की । उसके अंदर हुए परिवर्तन को महसूस कर भगवान बुद्ध उसके घर भोजन लेने उपस्थित हुए……!!!!!

Story of bhagwan buddha

“आप दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसंद नहीं। व्यापारी का अहंकार इतना प्रबल था कि उसके देखते हुए उसके परिजन भी अहंकार के वशीभूत हो गए””!!!

ज्ञान कोई भी हो वह तभी सार्थक होता है, जब उसको व्यावहारिक रूप में जीवन में उतारा जाता है। केवल प्रवचन सुनने या उसका अध्ययन करने से कुछ प्राप्त नहीं होता है !!!

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